Doha
सबै रसाइण मैं क्रिया, हरि सा और न कोई
तिल इक घर मैं संचरे, तौ सब तन कंचन होई
अटकी भाल शरीर में तीर रहा है टूट
चुम्बक बिना निकले नहीं कोटि पटन को फ़ूट

Kabir Das was a 15th-century Indian mystic poet and saint, whose writings influenced Hinduism's Bhakti movement and Sikhism.
सबै रसाइण मैं क्रिया, हरि सा और न कोई
तिल इक घर मैं संचरे, तौ सब तन कंचन होई
कहता तो बहुत मिला, गहता मिला न कोय ।
सो कहता वह जान दे, जो नहिं गहता होय
हरि संगत शीतल भया, मिटी मोह की ताप ।
निशिवासर सुख निधि, लहा अन्न प्रगटा आप
साँई मेरा वाणियां, सहति करै व्यौपार
बिन डांडी बिन पालड़ै तौले सब संसार
साकट संग न बैठिये करन कुबेर समान
ताके संग न चलिये, पड़ि हैं नरक निदान
ज्ञान समागम प्रेम सुख, दया भक्ति विश्वास ।
गुरु सेवा ते पाइये, सद्गुरु चरण निवास
काज परै कछु और है, काज सरै कछु और
रहिमन भँवरी के भए नदी सिरावत मौर
पुरुष पूजें देवरा, तिय पूजें रघुनाथ
कहँ रहीम दोउन बनै, पॅंड़ो बैल को साथ
एक उदर दो चोंच है, पंछी एक कुरंड
कहि रहीम कैसे जिए, जुदे जुदे दो पिंड
रहिमन दानि दरिद्र तर, तऊ जाँचबे योग
ज्यों सरितन सूखा परे, कुआँ खनावत लोग
जो रहीम तन हाथ है, मनसा कहुँ किन जाहिं
जल में जो छाया परी, काया भीजति नाहिं
राम नाम जान्यो नहीं, भइ पूजा में हानि
कहि रहीम क्यों मानिहैं, जम के किंकर कानि