Doha
जो घर ही में घुस रहे, कदली सुपत सुडील
तो रहीम तिनतें भले, पथ के अपत करील
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Rahimpoet · 1556–1627
Abdul Rahim Khan-i-Khana, known as Rahim, was a poet in the court of Mughal Emperor Akbar, famous for his Hindi dohas on life and wisdom.
जो घर ही में घुस रहे, कदली सुपत सुडील
तो रहीम तिनतें भले, पथ के अपत करील
तासों ही कछु पाइए, कीजै जाकी आस
रीते सरवर पर गये, कैसे बुझे पियास
सौदा करो सो करि चलौ, रहिमन याही बाट
फिर सौदा पैहो नहीं, दूरी जान है बाट
बड़ माया को दोष यह, जो कबहूँ घटि जाय
तो रहीम मरिबो भलो, दुख सहि जिय बलाय
महि नभ सर पंजर कियो, रहिमन बल अवसेष
सो अर्जुन बैराट घर, रहे नारि के भेष
मान सहित विष खाय के, संभु भये जगदीस
बिना मान अमृत पिये, राहु कटायो सीस
अब रहीम चुप करि रहउ, समुझि दिनन कर फेर
जब दिन नीके आइ हैं बनत न लगि है देर
अमर बेलि बिनु मूल की, प्रतिपालत है ताहि
रहिमन ऐसे प्रभुहिं तजि, खोजत फिरिए काहि
एक उदर दो चोंच है, पंछी एक कुरंड
कहि रहीम कैसे जिए, जुदे जुदे दो पिंड
अंजन दियो तो किरकिरी, सुरमा दियो न जाय
जिन आँखिन सों हरि लख्यो, रहिमन बलि बलि जाय
अंड न बौड़ रहीम कहि, देखि सचिक्कन पान
हस्ती-ढक्का, कुल्हड़िन, सहैं ते तरुवर आन
पुरुष पूजें देवरा, तिय पूजें रघुनाथ
कहँ रहीम दोउन बनै, पॅंड़ो बैल को साथ