Doha
जो घर ही में घुस रहे, कदली सुपत सुडील
तो रहीम तिनतें भले, पथ के अपत करील
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Rahimअनुचित उचित रहीम लघु, करहिं बड़ेन के जोर
ज्यों ससि के संजोग तें, पचवत आगि चकोर
Abdul Rahim Khan-i-Khana, known as Rahim, was a poet in the court of Mughal Emperor Akbar, famous for his Hindi dohas on life and wisdom.
जो घर ही में घुस रहे, कदली सुपत सुडील
तो रहीम तिनतें भले, पथ के अपत करील
अच्युत-चरण-तरंगिणी, शिव-सिर-मालति-माल
हरि न बनायो सुरसरी, कीजो इंदव-भाल
अधम वचन काको फल्यो, बैठि ताड़ की छाँह
रहिमन काम न आय है, ये नीरस जग माँह
अनकीन्हीं बातैं करै, सोवत जागे जोय
ताहि सिखाय जगायबो, रहिमन उचित न होय
तासों ही कछु पाइए, कीजै जाकी आस
रीते सरवर पर गये, कैसे बुझे पियास
अन्तर दाव लगी रहै, धुआँ न प्रगटै सोइ
कै जिय आपन जानहीं, कै जिहि बीती होइ
दुख में सुमरिन सब करे, सुख में करे न कोय ।
जो सुख में सुमरिन करे, दुख काहे को होय
तिनका कबहुँ न निंदिये, जो पाँयन तर होय ।
कबहुँ उड़ आँखिन परे, पीर घनेरी होय
फूटी आँख विवेक की, लखे ना सन्त असन्त ।
जाके संग दस-बीस हैं, ताको नाम महन्त
हरि संगत शीतल भया, मिटी मोह की ताप ।
निशिवासर सुख निधि, लहा अन्न प्रगटा आप
दाया कौन पर कीजिये, का पर निर्दय होय ।
सांई के सब जीव है, कीरी कुंजर दोय
साँई आगे साँच है, साँई साँच सुहाय ।
चाहे बोले केस रख, चाहे घौंट भुण्डाय