Doha
तैं रहीम अब कौन है, एती खैंचत बाय
खस कागद को पूतरा, नमी माँहि खुल जाय
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Rahimरहिमन ठहरी धूरि की, रही पवन ते पूरि
गाँठ युक्ति की खुलि गई, अंत धूरि को धूरि
Abdul Rahim Khan-i-Khana, known as Rahim, was a poet in the court of Mughal Emperor Akbar, famous for his Hindi dohas on life and wisdom.
तैं रहीम अब कौन है, एती खैंचत बाय
खस कागद को पूतरा, नमी माँहि खुल जाय
यह रहीम निज संग लै, जनमत जगत न कोय
बैर, प्रीति, अभ्यास, जस, होत होत ही होय
जो घर ही में घुस रहे, कदली सुपत सुडील
तो रहीम तिनतें भले, पथ के अपत करील
पुरुष पूजें देवरा, तिय पूजें रघुनाथ
कहँ रहीम दोउन बनै, पॅंड़ो बैल को साथ
मुनि नारी पाषान ही, कपि पसु गुह मातंग
तीनों तारे राम जू, तीनों मेरे अंग
तासों ही कछु पाइए, कीजै जाकी आस
रीते सरवर पर गये, कैसे बुझे पियास
दुख में सुमरिन सब करे, सुख में करे न कोय ।
जो सुख में सुमरिन करे, दुख काहे को होय
जिहिं हिरदै हरि आइया, सो क्यूं छाना होइ ।
जतन-जतन करि दाबिये, तऊ उजाला सोइ
फूटी आँख विवेक की, लखे ना सन्त असन्त ।
जाके संग दस-बीस हैं, ताको नाम महन्त
हरि संगत शीतल भया, मिटी मोह की ताप ।
निशिवासर सुख निधि, लहा अन्न प्रगटा आप
दाया कौन पर कीजिये, का पर निर्दय होय ।
सांई के सब जीव है, कीरी कुंजर दोय
मार्ग चलते जो गिरा, ताकों नाहि दोष ।
यह कबिरा बैठा रहे, तो सिर करड़े दोष