Doha
दुख में सुमरिन सब करे, सुख में करे न कोय ।
जो सुख में सुमरिन करे, दुख काहे को होय
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Kabirबलिहारी गुरु आपनो, घड़ी-घड़ी सौ सौ बार
मानुष से देवत किया करत न लागी बार
Kabir Das was a 15th-century Indian mystic poet and saint, whose writings influenced Hinduism's Bhakti movement and Sikhism.
दुख में सुमरिन सब करे, सुख में करे न कोय ।
जो सुख में सुमरिन करे, दुख काहे को होय
तिनका कबहुँ न निंदिये, जो पाँयन तर होय ।
कबहुँ उड़ आँखिन परे, पीर घनेरी होय
हरि संगत शीतल भया, मिटी मोह की ताप ।
निशिवासर सुख निधि, लहा अन्न प्रगटा आप
फूटी आँख विवेक की, लखे ना सन्त असन्त ।
जाके संग दस-बीस हैं, ताको नाम महन्त
दाया कौन पर कीजिये, का पर निर्दय होय ।
सांई के सब जीव है, कीरी कुंजर दोय
साँई आगे साँच है, साँई साँच सुहाय ।
चाहे बोले केस रख, चाहे घौंट भुण्डाय
एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास
एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास
दिएँ पीठि पाछें लगै सनमुख होत पराइ
तुलसी संपति छाँह ज्यों लखि दिन बैठि गँवाइ
जो घर ही में घुस रहे, कदली सुपत सुडील
तो रहीम तिनतें भले, पथ के अपत करील
तासों ही कछु पाइए, कीजै जाकी आस
रीते सरवर पर गये, कैसे बुझे पियास
हरी हरी करुना करी, सुनी जो सब ना टेर
जब डग भरी उतावरी, हरी करी की बेर
रहिमन दानि दरिद्र तर, तऊ जाँचबे योग
ज्यों सरितन सूखा परे, कुआँ खनावत लोग